सुचना: प्रिय मैथिल बंधूगन, किछ मैथिल बंधू द्वारा सोसिअल नेटवर्क (फेसबुक) पर एक चर्चा उठाओल गेल " यो मैथिल बंधूगन कहिया ई दहेजक महा जालसँ मिथिला मुक्त हेत ?" जकरा मैथिल बंधुगणक बहुत प्रतिसाद मिलल! तहीं सँ प्रेरीत भs कs आय इ जालवृतक निर्माण कएल गेल अछि! सभ मैथिल बंधू सँ अनुरोध अछि, जे इ जालवृत में जोर - शोर सँ भागली, आ सभ मिल सपथ ली जे बिना इ प्रथा के भगेना हम सभ दम नै लेब! जय मैथिली, जय मिथिला,जय मिथिलांचल!
नोट: यो मैथिल बंधुगन आओ सभ मिल एहि मंच पर चर्चा करी जे इ महाजाल सँ मिथिला कोना मुक्त हेत! जागु मैथिल जागु.. अपन विचार - विमर्श एहि जालवृत पर प्रकट करू! संगे हम सभ मैथिल नवयुवक आ नवयुवती सँ अनुरोध करब, जे अहि सबहक प्रयास एहि आन्दोलन के सफलता प्रदान करत! ताहीं लेल अपने सभ सबसँ आगा आओ आ अपन - अपन विचार - विमर्श एहि जालवृत पर राखू....
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सोमवार, 19 सितंबर 2011

दहेज मुक्ति के लिए मिथिलांचल में शुरू हुआ नया प्रयास( पवन झा)”अग्निवाण”


भारतीय संस्कृति के प्राचीन जनपदों में से एक राजा जनक की नगरी मिथिला का अतीत जितना स्वर्णिम था वर्तमान उतना ही विवर्ण है। देवभाषा संस्कृत की पीठस्थली मिथिलांचल में एक से बढ़कर एक संस्कृत के विद्वान हुए जिनकी विद्वता भारतीय इतिहास की धरोहर है। उपनिषद के रचयिता मुनि याज्ञवल्क्य, गौतम, कनाद, कपिल, कौशिक, वाचस्पति, महामह गोकुल वाचस्पति, विद्यापति, मंडन मिश्र, अयाची मिश्र, जैसे नाम इतिहास और संस्कृति के क्षेत्र में रवि की प्रखर तेज के समान आलोकित हैं। चंद्रा झा ने मैथिली में रामायण की रचना की। हिन्दू संस्कृति के संस्थापक आदिगुरु शंकराचार्य को भी मिथिला में मंडन मिश्र की विद्वान पत्नी भारती से पराजित होना पड़ा था। कहते हैं उस समय मिथिला में पनिहारिन से संस्कृत में वार्तालाप सुनकर शंकराचार्य आश्चर्यचकित हो गए थे।
कालांतर में हिन्दी व्याकरण के रचयिता पाणिनी , जयमंत मिश्र, महामहोपाध्याय मुकुन्द झा बक्शीमदन मोहन उपाध्याय, राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर”, बैद्यनाथ मिश्र यात्रीअर्थात नागार्जुन, हरिमोहन झा, काशीकान्त मधुप, कालीकांत झा, फणीश्वर नाथ रेणु, बाबू गंगानाथ झा, डॉक्टर अमरनाथ झा, बुद्धिधारी सिंह दिनकर, पंडित जयकान्त झा, डॉक्टर सुभद्र झा, जैसे उच्च कोटि के विद्वान और साहित्यिक व्यक्तित्वों के चलते मिथिलांचल की ख्याति रही। आज भी राष्ट्रीय स्तर पर ख्यातिप्राप्त कतिपय लेखक, पत्रकार, कवि मिथिलांचल से संबन्धित हैं। मशहूर नवगीतकार डॉक्टर बुद्धिनाथ मिश्रा, कवयित्री अनामिका सहित समाचार चैनल तथा अखबारों में चर्चित पत्रकारों का बड़ा समूह इस क्षेत्र से संबंधित है। मगर इसका फायदा इस क्षेत्र को नहीं मिल पा रहा। राज्य और केंद्र सरकार द्वारा अनवरत उपेक्षा और स्थानीय लोगों की विकाशविमुख मानसिकता के चलते कभी देश का गौरव रहा यह क्षेत्र आज सहायता की भीख पर आश्रित है। बाढ़ग्रस्त क्षेत्र होने के कारण प्रतिवर्ष यह क्षेत्र कोशी, गंडक, गंगा आदि नदियों का प्रकोप झेलता है। ऊपर से कर्मकांड के बोझ से दबा हुआ यह क्षेत्र चाहकर भी विकास की नयी अवधारणा को अपनाने में सफल नहीं हो पा रहा। जो लोग शैक्षणिक, आर्थिक और सामाजिक रूप से सक्षम हैं भी वे आत्मकेंद्रित अधिक हैं इसीलिए उनका योगदान इस क्षेत्र के विकास में नगण्य है। मिथिलांचल से जो भी प्रबुद्धजन बाहर गए उन्होने कभी घूमकर इस क्षेत्र के विकास की ओर ध्यान नहीं दिया। पूरे देश और विश्व में मैथिल मिल जाएँगे मगर अपनी मातृभूमि के विकास की उन्हें अधिक चिंता नहीं है।
ऐसे में सामाजिक आंदोलन की जरूरत को देखते हुए स्थानीय और प्रवासी शिक्षित एवं आधुनिक विचारों के एक युवा समूह ने नए तरीके से मिथिलाञ्चल में अपनी उपस्थिती दर्ज़ कराई है। दहेज मुक्त मिथला के बैनर तले संगठित हुए इन युवाओं ने अपनी इस मुहिम का नाम दिया है दहेज मुक्त मिथिला
दहेज मुक्त मिथिलाजैसा कि नाम से ही स्पष्ट है कि यह एक ऐसा आंदोलन है जिसकी बुनियाद दहेज से मुक्ति के लिए रखी गयी है। बिहार के महत्वपूर्ण क्षेत्र मिथिलांचल से जुड़े और देश-विदेश में फैले शिक्षित और प्रगतिशील युवाओं के एक समूह ने मैथिल समाज से दहेज को खत्म करने के संकल्प के साथ इस आंदोलन की शुरुआत की है। सामंती सोच के मैथिल समाज में यूं तो इस आंदोलन को आगे बहुत सी मुश्किलों का सामना करना है मगर शुरुआती तौर पर इसे मिल रही सफलता से ऐसा लग रहा है कि मिथिलांचल के आम लोगों में दहेज के प्रति वितृष्णा का भाव घर कर गया है और वे इससे निजात पाना चाहते हैं।
दहेज मुक्त मिथिला के अध्यक्ष प्रवीण नारायण चौधरी कहते हैं कि मिथिलांचल में अतीत मे स्वयंवर की प्रथा थी जिसका प्रमाण मिथिला नरेश राजा जनक की कन्या सीता का स्वयंवर है। समय के साथ मिथिलांचल में भी शादी के मामले में विकृति आई और नारीप्रधान यह समाज पुरुषों की धनलिपसा का शिकार होता गया। कभी इस समाज में शादी में दहेज के नाम पर झूटका(ईंट का टुकड़ा) गिनकर दिया जाता था वहीं आज दहेज की रकम लाखों में पहुँच गयी है। दहेज के साथ बाराती की आवाभगत में जो रुपये खर्च होते हैं उसका आंकलन भी बदन को सिहरा देता है। जैसे- जैसे समाज में शिक्षा का प्रचार-प्रसार बढ़ा है दहेज की रकम बढ़ती गयी है।श्री चौधरी आगे कहते हाँ कि बड़ी बिडम्बना है कि लोग लड़कियों की शिक्षा पर हुई खर्च को स्वीकार करना भूल जाते हैं।
संस्था की उपाध्यक्षा श्रीमती करुणा झा कहती हैं कि मिथिलांचल की बिडम्बना यह रही है कि यहाँ नारी को शक्ति का प्रतीक मानकर सामाजिक तौर पर तो खूब मर्यादित किया गया पर परिवार में उसे अधिकारहीन रखा गया। उसका जीवन परिवार के पुरुषों की मर्ज़ी पर निर्भरशील हो गया। शादी की बात तो दूर संपत्ति में भी उसकी मर्ज़ी नहीं चली। इसीलिए दहेज का दानव यहाँ बढ़ता ही गया। लड़कियां पिता की पसंद के लड़के से ब्याही जाने को अभिशप्त रहीं। इसका असर यह हुआ कि बेमेल ब्याह होने लगे और समाज में लड़कियां घूंट-घूंट कर जीने-मरने को बिवश हो गईं।
इस मुहिम को मिथिलांचल के गाँव-गाँव में प्रचारित-प्रसारित करने हेतु आधुनिक संचार माध्यमों के साथ- साथ पारंपरिक उपायों का भी सहारा लिया जा रहा है। पूरे देश में फैले सदस्य अपने-अपने तरीके से इस मुहिम को प्रचारित कर रहे हैं।
एक समय मिथिलांचल में सौराठ सभा काफी लोकप्रिय था जहां विवाह योग्य युवक अपने परिवार के साथ उपस्थित होते थे और कन्या पक्ष वहाँ जाकर अपनी कन्या के लिए योग्य वर का चुनाव करते थे। यह प्रथा दरभंगा महाराज ने शुरू कारवाई थी। शुरुआती दिनों में संस्कृत के विद्वानों की मंडली शाश्त्रार्थ के लिए वहाँ जाती थी। राजा की उपस्थिति में शाश्त्रार्थ में हार-जीत का निर्णय होता था। यदि कोई युवा अपने से अधिक उम्र के विद्वान को पराजित करता था तो उस युवक के साथ पराजित विद्वान अपनी पुत्री की शादी करवा देता था । बाद में यह सभा बिना शाश्त्रार्थ के ही योग्य वर ढूँढने का जरिया बन गया। आधुनिक काल के लोगों ने इस सभा को नकार कर मिथिलांचल की अभिनव प्रथा को खत्म करने का काम किया।
संस्था के सलाहकार वरिष्ठ आयकर अधिकारी ओमप्रकाश झा कहते हैं की मिथिलांचल को अपनी पुरानी प्रथा के जरिये ही सुधार के रास्ते पर आना होगा। प्रतिवर्ष सौराठ सभा का आयोजन हो और लोग योग्य वर ढूँढने के लिए वहाँ आयें जिसमें पहली शर्त हो की दहेज की कोई बात नहीं होगी तो दहेज पर लगाम लगाना संभव हो सकता है। पहले भी सौराठ में दहेज प्रतिबंधित था। विवाह में बाराती की संख्या पर भी अंकुश लगाने की जरूरत है। संप्रति देखा जा रहा है कि मिथिललांचल में शादियों में बारातियों की संख्या और उनके खान-पान की फेहरिस्त बढ़ती ही जा रही है। गरीब तो दहेज से अधिक बारातियों की संख्या से डरता है।
बात सिर्फ आर्थिक लेन-देन तक सीमित हो तो भी कोई बात है। अब तो कन्या के साथ साज-ओ-सामान की जो फेहरिस्त प्रस्तुत की जाती है वह बड़ों-बड़ों के होश उड़ा देता है। उस पर भी आलम यह है कि अधिकतर लड़कियां विवाह के बाद दुखमय जीवन बिताने को मजबूर है क्योंकि स्थानीय स्तर पर कोई उद्योग नहीं है और परदेश में खर्च का जो आलम है वह किसी से छुपा नहीं है।
दहेज मुक्त मिथिलाआंदोलन के जरिये मैथिल समाज में सुधार की एक नयी धारा चलाने में जुटे लोगों के सामने सबसे बड़ी चुनौती मैथिल समाज के उन लोगों से आएगी जो महानगरों में रहकर अच्छी नौकरी या व्यवसाय के जरिये आर्थिक रूप से समृद्ध हो चुके हैं और दहेज को अपनी सामाजिक हैसियत का पैमाना मानते हैं। ऐसे लोग निश्चित रूप से विकल्प की तलाश में इस आंदोलन को कुंद करने का प्रयास करेंगे जिसे सामूहिक सामाजिक प्रतिरोध के जरिये ही रोका और दबाया जा सकता है। कुछ राजनेता जो अपने को मैथिल समाज का मसीहा मानते हैं उनके लिए भी ऐसा आंदोलन रुचिकर नहीं है। पर वक़्त की जरूरत है कि यह क्षेत्र ऐसे आंदोलनों के जरिये अपने में सुधार लाये।

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मंगलवार, 5 जुलाई 2011

दिल्ली चलू! दिल्ली चलू!!

२८ सेप्टेम्बर, २०११ - नवरात्राके पहिल दिन - एक एहेन जयन्ती पारब जाहि सँ समस्त मैथिली-मिथिलाके कार्यरत संस्था जिनक उद्देश्य भाषा, संस्कृति एवं समग्र मिथिला भूमि के कल्याण हेतु छन्हि - सभके एक प्लेटफार्मपर जोड़ैत एक एहेन अपूर्व कार्यक्रम दहेज मुक्त मिथिलाके तरफ सँ आयोजन कैल जाय जाहि के माध्यम सँ आब २१वीं शताब्दीमे...ं बेटा आ बेटी एकसमान छथि आ जन्म सँ पहिले कन्या-भ्रूण-हत्याके घोर विरोध स्वरूप दहेजरूपी दानवके अपन परिष्कृत समाजसँ दूर भगाबय लेल एकजूट आह्वान करब - जेकर संवाद नहि सिर्फ मिथिला बल्कि समस्त भारत, नेपाल, भूटान संग विश्व समुदायमें शंखध्वनि जेतैक आ लोकलज्जाके रक्षा करैत बहुतो मिथिलाके संतान एवं समग्र जनमानसमें एहि कुप्रथाके अन्त करैक स्फूरणा जगतैक।

स्थान के निर्धारण अबैवाला समयमें - जुलाई के आखिरी तक करब।

कार्यक्रमके प्रारूप:

१. मिथिला झांकी प्रदर्शनी - नगर परिक्रमा संग शुरु करैत मैथिली वा मिथिला संग जुड़ल दिल्लीमें जे कोनो प्रतीकात्मक चिह्न अछि ताहि ठाम वा एक विद्यापति के मूर्ति अनावरण करैक योजना ऊपर सेहो निर्णय करैत हुनकहि प्रतिमाके माल्यार्पण करैत कार्यक्रमके उद्‍घोष-उद्‍घाटन करब। चूँकि दिल्लीमें विद्यापतिक एहेन कोनो प्रतिमा पहिले सँ स्थापित अछि वा नहि से हमरा जानकारी नहि अछि, ताहिलेल अपने लोकनि जे दिल्ली सँ छी से एहि विन्दुपर मन्थन करैत निर्णय करी से आग्रह।

२. मिथिला खानपान स्टॅल के उद्‍घाटन जाहिठाम मिथिलाके विशिष्ट परिकार - व्यञ्जन आदिके खूबसूरत प्रदर्शनी संग सहभागी समस्त मिथिलावासीके लेल एक विशेष उत्सवके अवसर। एहिलेल खानपान सामग्रीके प्रबन्ध सेहो कोनो मैथिल द्वारा होइक चाही। एहेन स्टॅलमें आयोजक द्वारा न्यूनतम सामग्री प्रायोजित होइक आ तेकर बाद व्यवसायिक दृष्टिकोण सँ सहभागिताके संभावित संख्याके अनुसार निजी व्यवसायीके ठेका देल जाय।

३. बाल-बालिकाके कला प्रस्तुति - बाल्य नाटक, नृत्य, चित्रकला (मिथिला पेन्टिंग), मिथिलालिपि लिखनिहार बच्चाके प्रोत्साहन आ एहेन अनेक विन्दु जे केवल आ केवल बच्चा सभमें मैथिलीप्रति झुकावके बरकरार राखैक।

४. विचार गोष्ठी - विद्वान्‌ विचारक, समाज सेवी, नेतृत्वकर्ता, मिथिला आइकान, प्रवासी मिथिलावासी एवं अन्य के समूचा भारत-नेपाल एवं संभव होय तऽ अन्य देश सँ सेहो सहभागी बनबैत दहेज एवं किछु अन्य महत्त्वपूर्ण मुद्दा जाहिमें मिथिलामें पर्यटनके विकास - मिथिलावासी स्वयं नव-मिथिलाके निर्माणकर्ता आदि राखल जाय।

५. सांस्कृतिक कार्यक्रम - नृत्य, संगीत, नाटक, आदि। समूचा दिल्लीके कलाकार जे मैथिली संग जुड़ल छथि आ तदोपरान्त आवश्यकता अनुसार बाहर सऽ कलाकार के सहभागिता कराओल जाय।

६. दिल्ली सम्मेलनके सारांश - दिल्ली उद्‍घोषणा पत्र के प्रकाशन आ कार्यक्रम समापन।

उपरोक्त प्रारूप ऊपर अपन टिप्पणी आ सुधारके लेल सुझाव लेल प्रार्थना।

प्रार्थी - प्रवीण

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मिथिला दहेज मुक्त कोना होयत ?

सामान्यतया घरमें जखन बेटी १८ वर्षके उम्र सँ गुजरि जैछ वा ताहू सऽ बेसी (यदा-कदा कमो...) होवय लगैछ तऽ एक अत्यन्त यथार्थ सोच सभके मस्तिष्क में आबय लगैछ जे आब बेटीके लेल योग्य घर ओ वरके चुनाव करैत कन्यादान करबाक अछि। तहु सऽ पहिने घरमें बेटीके माय बेटीके पिताके खखोरय लगैत छथिन जे हे आबो यदि कतहु बुच्चीलेल सुयोग्...य वरके नहि खोजब तऽ कहिया खोजब... आ एहि प्रकारें शुरु होइछ तकैया। कुटुम्ब आ सम्बन्धीके संग होवय लगैछ वार्तालाप जे कनेक बुचिया लेल कोनो घर-वर देखबैक। ताही क्रममें कोनो योग्य घर-वरके सुझाव आदि सेहो भेटैछ आ चलय लगैछ माथा-पच्ची।

एक बात करू अहाँ गौर यदि,
घरके छथि बनल बोझ बेटी??

प्रकृतिके विडंबना नहि तऽ कि,
पराया घरके लेल बनली बेटी!! :(

खैर - विडंबना सही, लेकिन भार अवश्य बेटी बनैछ अपन जन्म देनिहारि माय-बाप-परिजन पर - अन्य भार नहियो तऽ एतबी जे कोन घर-वर भेटत हिनका लेल। केना के व्यवस्था गानब, केना कि हेतैक, कतेक खर्च करब, केहेन लड़का चाही, अनेको प्रश्न उठैछ हिनक मस्तिष्क में। उद्वेलित हृदय माय-बाप के लेल कोन सहायता बेटी कय सकैत छथि आखिर? ओहो कसमकस में अपन जीवन संगीके लेल सपना देखैत गुमशुम अपन माय-बाप-परिजनके हुनका सदाके लेल पराया बनबैक योजना बनबैत कखनहु नुका के तऽ कखन देवालमें कान सटाय के तऽ कखनहु कोना आ कखनहु कोना... बस अपन मुँह खोलती तऽ केकरा लग... संगी, साथी आ माय-बहिन - हिनके सभ लग अपन किछु विचार प्रकट करैत छथि। बाकी, हिनकर चुप्पी बहुत मार्मिक आ सभ्यताके चाप आ वजन सऽ चापल रहैत छन्हि। यदि ओ अपन विचार खूलिके राखैत छथि तऽ सर-ओ-समाज एक सय उलहन देतन्हि। बेटी चुप छथि मोटामोटी। संसारमें बेटी सभ आब कोनो प्रकार सऽ पाछां नहि छथि, मुदा मिथिलाके बेटी एखनहु अपन सभ्यताके बंधनमें बान्हल छथि। माय-बाप-परिजन एसगरे हिनक भविष्यके लेल व्यग्र छथि। बेटी चाहितो किछु बाजि नहि रहल छथि। जे बजली, हुनका लोकके नजरिमें खसय पड़ैछ। लोक सौ किसिम के हुनका विषयमें अफवाह फैलाबैछ। हलांकि आब किछु प्रतिशत परिवर्तन माँ मैथिलीके भूमि मिथिलामें सेहो देखबा में आबय लागल छैक... लगैछ जे बहुत दिनके दबल ज्वालामूखी फूटय लागल अछि। जे बेटी के इ ज्ञान छन्हि जे जीवन हुनक थिकन्हि आ कोनो निर्णयमें प्रथम अधिकार माता-पिताके समर्पित करितो हुनकर व्यक्तिगत सोच आ सुझाव शामिल रहबाक जरुरी छैक, ओ सभ अपन माता-पिता-परिजन संग खूलिके व्यवहार करैय लागल छथि। एतय तक कि बहुत पढल-लिखल परिवार बेटीके एतेक स्वतन्त्रता देबय लागल छथि जे बेटीके भावना सर्वोपरि, बेटी अपन कैरियर निर्माण के लेल मेहनत करैत आब गामो सऽ बाहर होस्टल आ शहरके अन्यान्य भागमें रहैत अपन जीवनके लेल लड़ाई करैत अपना संग-संग पारिवारिक मान-मर्यादाके रक्षा करैत आगू बढय लगलीह, तखन अपन जीवनसंगीके चुनावमें हुनक अधिकार प्रथम रहबाक चाही। देखू! बाहर सऽ देखलापर इ बात बहुत खींचतान होइत बुझैत छैक। लेकिन वास्तविकता यैह छैक, सभ परिवारमें एहने स्थिति छैक। समूचा मिथिला आब केवल आ केवल एक विन्दुपर अत्यन्त पाछू पड़ि रहल अछि ओ इ जे दहेज प्रथा के दबाव आ घर-वरके चुनाव अत्यन्त जटिल भऽ गेल छैक। पहिले इ निर्णय करय में सहज छलैक - कारण नौकरी के किसिम अधिकांशतः सरकारी छलैक आ बेशक सरकारी नौकरीवाला लड़का के माँग होइत छलैक। तहिना व्यवसायी वा कृषि क्षेत्रमें जेकर उच्च ओहदेदार छवि छलैक ओकरो किछु माँग होइत छलैक। तदोपरान्त लोक अपन चुनाव एहेन वर-घरके करैत छल जाहिमें एक-दोसरके क्षमता आ सामान्य माँगके पूरा करैके औकात आदि विन्दु बनैत छलैक सहायक निर्णय करय में। आब कनेक समस्या छैक। आब, बेटीके शिक्षा आ बेटाके शिक्षामें एक तऽ बहुत अन्तर नहि छैक - दोसर आब लड़काके योग्यता अनुसार विभिन्न प्रकार के नौकरी जाहिमें सरकारी कम आ निजी क्षेत्रमें बेसी रोजगार छैक। जमीन-जथा सेहो आब पहिले जेकां लोक लग नहि छैक। यदि छहियो तऽ ओकर उत्पानशीलतामें ओ दम नहि जे पहिलुका समय में होइत छलैक। तदापि खींचतान रहितो व्यवस्थामें एखन धरि कोनो उद्वेलन छैक से अधिकांशतः नहि छैक। हाँ, उद्वेलन जतय छैक ओतय समाजिक बंधनके तोड़ैत विभिन्न प्रकार के विवाह सभ होवय लागल छैक।

बेटाके लेल वधु के चुनाव सेहो एक मुख्य समस्या छैक आब... लेकिन दहेज के लोभ मनुष्यके विवेकहीन बनबैत छैक। तहू में जे आजुक अर्थ-प्रधान युग छैक, आब न्युनतम व्यवहारके निर्वाह करैक लेल सेहो लाख टाका के जोगार तऽ चाहबे करी। तखन समग्र रूप सऽ देखल जाय तऽ समस्याके निदान जटिल पहाड़ समान ठाड़्ह छैक। एक विद्वान्‌ कहलखिन जे यदि बेटाके सभ संस्कार लोक अपनहि लगानी सँग सम्पन्न करैत छथि, तखन वैवाहिक संस्कार बेर में बेटीवाला पर बेसी भार देवाक कि कारण? कि बेटावाला ताहिमें सक्षम नहि छथि?? छथि। मुदा हुनका ऊपर तऽ बेटीवालाके मजबूरी आ दहेज के लोभ - इ दुनू विन्दु सहायक बनैत इ आश दैत छन्हि जे चल ने भाइ... कियो तऽ एबे करता आ फलां के विवाह सेहो नीके जगह पर हेतैक। लेकिन आब औसतन लड़का सभके उम्र ३० वर्ष भऽ गेलैक अछि - संभवतः केओ कुटुम्ब एथिन आ विवाह के प्रस्ताव देथिन आ एहि बेरका लगन में ओकर विवाह भऽ जेतैक। प्राइवेटमें लड़का एकाउन्टेन्ट अछि, आइटी प्रोफेशनल अछि... नीक दहेज सेहो भेट जेतैक। औसतमें ५ लाख के माँग बनबे करतैक। ;) त्याग के भावना मुश्किल सऽ ५‍% परिवार में रहैछ। लेकिन आखिर बेटावाला के सेहो बेटी छैक ने... तखन यदि बेटामें पाइ नहि लेथिन तऽ बेटीके विवाहमें कोना के पाइ देथिन...! इत्यादि द्वंद्व सभ जगह छैक। आब??

सर्वविदिते अछि जे आइ-काल्हि बेटीके जन्म सऽ पहिने शान्त करैक लेल सेहो अनेक उपाय आबि गेल छैक आ जनसंख्यामें असंतुलन एकर सभ सऽ पैघ प्रमाण थिकैक। यौ जी! बेटीके जन्म देबय सऽ पहिले यदि योजना सेट भऽ जेतैक तखन आगू माय के बनथिन? डेराउ नहि! बेटीके जन्म लेबय दियौक। सभ अपन भाग्य सऽ अबैत छैक एहि पृथ्वीपर। जेना विश्वंभर जन्म लेबय सऽ पहिने मायके स्तनमें जन्म लेबयवाला बच्चालेल पोषण के इन्तजाम कय दैत छथिन, तहिना आगुओ हुनकहि सनातन सिद्धान्त कार्यरत हेतैक।

चिन्ता कथीके स्वयं ओ पुरारी,
लाचार देखता पठौता सवारी!
लेता खबरि ओ सुनैत देरिया.... :)

आ, दहेज के पैसा कोन काजक?? देखियौ ने! कतेको उदाहरण तऽ सामने अछि। कतेक गोटाके दहेज के पैसा फबैत छन्हि से!! ;) सभटा तऽ जैछ बाजार के दोकान में!! पाइ लेलियैक तऽ आब सोनाके व्यवहार, इ आडंबर, ओ आडंबर... अनेक बात। सभमें शुद्धके समयके महंगाईके मार!! सोलह आनामें सऽ चारि आना तऽ फोकटमें उड़ल। एम्हर बरियाती जेतैक तऽ एकहि रंग के स्कोर्पियो गाड़ी के लाइन जरुर लगबाक चाही। लड़काके दोस्त सब शहर सऽ एतैक तऽ दारू-पानी आ बैण्ड बाजावाला ओ पंजाबी धून पर खूब ढोल पीटतैक तखन ने छौड़ा सभ डांड़्ह लचकायत। घोघटमें कम-दामी साड़ी कोना देबैक! लड़की के कर-कुटुम्ब सभके लेल केहनो कपड़ा देबैक तऽ सेहो नहि हेतैक... ! हरिः ॐ! कतय सऽ पाइ बचत? सभटा गेल बनियां के दोकान में।

परिवर्तन के लेल क्रान्ति - क्रान्ति के लेल बेटी सभ द्वारा कड़ा फैसला - बेटा के द्वारा त्यागके उदाहरण बनौनाइ - आडंबर के समाप्त केनै - समाजमें एक नियम बनेनै जे आब फलां समाजमें दहेज के व्यवहार प्रतिबन्धित अछि। लोक नहि सिर्फ ताहि ठाम अपन सम्बन्ध बनाबैक लेल लालायित हेता बल्कि ओहेन गामके - समाजके खूब नाम आयत। आदर्श समाजके निर्माण लेल दहेज के स्वस्फूर्त विरोध जरुरी। कोनो दाकियानुसी सोच नहि आब!! समस्याके हल्लूक बूझब मूर्खता।

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शनिवार, 26 मार्च 2011

दहेज़ प्रथा रोकबाक लेल विचार करत बिहार - सरकार...

इ समाचार सुईंन के जतेक हम खुश भेलो, शायद अहूँ ओतबे खुश होयब...
आय मुंबई में एक समाचार पत्र (यशोभूमि) में एक खबर पढ्लो जाहीं सँ हमरा इ महसूस भेल जे "दहेज़ मुक्त मिथिला" के पुकार बिहार - सरकार सुईंन लेलक...

बिहार सरकार आय स्वीकार केलक कि दहेज़ प्रथाक बुराई के समाप्त करबाक लेल मौजूदा उपाय के अलावा जिलाधिकारी आर पुलिस अधीक्षक के व्यापक अधिकार देबाक लेल विचार करब जरुरी अछि, किए कि अदालत में एहेंन मामला के निपटाबै में बहुत बेसी समय लागैत अछि ! समाज कल्याण मंत्री परवीन अमानुल्लाह प्रश्नोत्तर काल में विधान परिषद में कहलखिन जे बिहार में दहेज़ प्रथा रोकबाक लेल कानून लागू अछि आर अलग - अलग जिला में ओई ठामक जिला कल्याण पदाधिकारी दहेज़ निषेध अधिकारीक रूप में काज के रहल छैथ आर महिला विकास निगम के प्रबंध निदेशक के राज्य में पनपल दहेज़ निषेध अधिकारीक रूप में नियुक्त करल गेल अछि!

समाज कल्याण मंत्री परवीन अमानुल्लाह कहलखिन जे दहेज़ कुप्रथा के रोकबाक लेल राज्य सरकार बहुत कार्यक्रम चले रहल छैथ आ लोग सभ के जागरूक करबाक प्रयास करल जे रहल अछि.....

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गुरुवार, 17 मार्च 2011

सौराठ सभा कि छी ?? - प्रवीण चौधरी

मैथिल विवाहके सभा छी - जाहिठाम लाखोंके संख्यामें वरागत एवं कन्यागत सभक जुटान होइत छल, आब एहिमें एकदम नगण्य सहभागिता भऽ रहल अछि... एहि जुटानमें पंजिकार सभके माध्यमसँ जोड़ी-मिलान एवं विवाह कार्यक्रमके निश्चित कैल जैत अछि।

एहि में सहभागी सभके कमी कियैक?

पहिले घर-कुटमैतीके माध्यमसँ घटकैती कम एवं सभाके माध्यमसँ बेसी होइत छल, लाखों वर-कन्यापक्षके भीड़ भेलाक कारण पंजिकार द्वारा अपन-रुचि-अनुसार वर-कन्याके जोड़ी मिलान होइत छल। क्रमशः जेना-जेना मिथिलाके लोकमें आर्थिक समृद्धि आयल तहिना-तहिना घर-कुटमैतीके संख्या बढय लागल... पहिले जतय हजारमें ब्यवस्था भऽ जाइत छल ताहिठाम क्रमशः लाखमें बात होवय लागल, जाहि कारण प्रत्येक वरागत पक्षमें लोभके प्रविष्टि भेल एवं एहि तरहें लोक सभागाछी कम आ घर-कुटमैतीके माध्यमसँ बेसी पाइ के लोभमें इ प्रथा में कमी आयल। सभागाछीमें एक कूरीतिके सेहो प्रवेश भेल - पंजिकार द्वारा एवं अन्य बिचौलियाके द्वारा ठकविद्या सेहो प्रवेश करैत लोकके विश्वासमें कमी आनैत गेल एवं एहि तरहें धीरे-धीरे तथाकथित नीक लोक सभके सहभागिता सेहो कम भेल। सरकारी उपेक्षा सेहो एक प्रमुख कारण भेल!

सभागाछी के फेर आवश्यकता किऐक?

आइ जखन मैथिल सभ मात्र अपन पूर्वजके भूमिटापर नहि बास करैत भारत एवं विश्वके अनेक कोनमें पहुँचि गेलाह अछि... कतेक गोटे तऽ सालमें एक बेर गाम अबैत छथि, कतेक गोटे तऽ पाँच साल आ कतेक गोटे तऽ १०-२०-२५ साल सऽ बाहरे छथि... तखन हिनक धिया-पुताके गाममें या मिथिलाके लड़की-लड़का कोना भेटत, ताहि हेतु एक केन्द्र जाहि ठाम निश्चित समयपर फेर पहिले जेकाँ भीड़ लागय एहि हेतु सभा गाछीके आवश्यकता अपरिहार्य बुझैछ।

सभागाछीके आधुनिकता कोना?

आइ कंप्युटरके युग छैक। पंजीकरणके कंप्युटर द्वारा डेटा-प्रोसेसिंग होयबाक चाही एवं सुटेबल मैचके निर्णय सेहो कंप्युटर मैचिंग/सर्चिंग अप्शन आदि द्वारा वेबसाइटके मार्फत उपलब्ध होइक, एवं समयपर हुनका लोकनिक समुचित साक्षात्कार हेतु सभा लगबाक चाही। एहि तरहें बेसी सँ बेसी सहभागिता सेहो होयत आ ठकविद्या आदि सेहो नहि चलत, लोक सभ एक दोसरके बारेमें कंप्युटर द्वारा पहिले सऽ जे जानकारी जुटायत से तऽ हेवे करतै आ सभामें आबि ओकरा प्रत्यक्ष आरो विकल्प सभ भेटतैक।

सामूहिक विवाह आदिके विकल्प सेहो खुलतैक।

सभ जाति हेतु इन्तजाम होयबाक जरुरी छैक।

सरकार द्वारा सेहो एहि प्रथाके प्रोत्साहन भेटतैक।

गरीबी रेखासँ नीचा हेतु सरकारके संग अन्य निजी दान एवं सहयोगके सेहो गुंजाइश बढतैक।

एहि प्रकारें - सम्बन्धित अनेक बात भऽ सकैछ जाहिपर हमर ध्यान नहि पहुँचल होयत, अपने लोकनि सेहो नीक विन्दुपर आरो प्रकाश द‍ऽ सकैत छी... दहेज आदि के सेहो स्वतः विरोध होइ, आदर्श कुटमैती होयत... अपने लोकनि अपन-अपन विचार राखू।

जय मैथिली! जय मिथिला!!

अपनेक विचार पढबाक आश में - प्रवीण चौधरी ‘किशोर’

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बुधवार, 16 मार्च 2011

संपूर्ण मिथिलावासी सँ हमर अपील!

संपूर्ण मिथिलावासीकेँ सूचित करैत अपार हर्ष भऽ रहल अछि जे आगामी २० जुन सँ २९ जुन २०११ धरि सौराठससौलासभा के मुहुर्त अछि। हलाँकि विगत किछु सालमें एहि सभाके समर्थन मूल्य में नहि सिर्फ ह्रास आयल बल्कि लगभग इ महत्त्वपूर्ण प्रथा लगभग लोपोन्मुख भऽ गेल अछि। जखन कि मैथिलवैवाहिकसभाके रूपमें प्रख्यात एहि सभाके मूल्य किनकहु सँ छुपल अछि से बात नहि। जेना-जेना हमरा लोकनि झूठ आ आडंबरमें फंसैत गेलहुँ, तहिना-तहिना मैथिली एवं मिथिलाके सर्वमान्य सिद्धान्त सभके छोड़ैत गेलहुँ। अतः समग्र मैथिल समाजसँ आग्रह जे एहि सभाके पुनर्जीवित करैक लेल, एकर गरिमाके पुनरुत्थान करैक लेल फेर सँ सभ केओ एकजूट भऽ के सभाके सफल आयोजन हेतु बेसी सँ बेसी संख्यामें सहभागी बनी।

एहि अभियानके जोर-शोरसँ प्रचार करय हेतु हमर निवेदन जे अपने जाहि गाम-शहर-बाजारमें जतेक मैथिल होइ, ताहि ठाम समुचित विज्ञापन एवं जन-जागरण के माध्यमसँ सभसँ सम्पर्क करैत हुनका लोकनिकेँ सौराठ सभामें उचित सहभागिता हेतु निवेदन करी।

जय मैथिली! जय मिथिला!!

अपनेक विचार पढबाक आश में - प्रवीण चौधरी ‘किशोर’

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शुक्रवार, 11 मार्च 2011

रस्ता के रोड़ा.. (इ कोई कहानी नहीं अछि!)

सोशल नेटवर्किंग के इ जमाना में हम किछु दिन स एकटा सोशल नेटवर्किंग साईट फेसबुक पर काफी सक्रीय रहैत छि.. अओर इ हमर अनुमान अछी जे बहुतेक लोग जे इन्टरनेट प्रयोग करैत होयताह, उ जरूर फेसबुक के बारे में बुझैत होयताह. फेसबुक पर एकटा मैथिलि स सम्बंधित बहस-सूत्र (Discussion thread) अछि जेकरा पर सदस्य सब मिथिला आ मैथिलि के बारे में अपन अपन राय विचार दैत रहैत छैथ. ओही बहस-सूत्र में एकटा माननीय सदस्य प्रश्न उठओलैथ जे हम सब मैथिल छी अओर इ मंच पर अपन राय मैथिलि के बजाय कोनो दोसर भाषा (मुख्यतः अंग्रेजी) में कियक दैत छि? बहुत गोटे के प्रतिक्रिया आयेल, किछु अपन विचार सभ्य तरीका में प्रकट केलैथ, त किछु लोग अंग्रेजी में लिखय वाला के खूब खिल्ली उदओलैथ.. (किछु अशोभनीय विशेषण भी देल गेल उनका लेल जे अपन राय अंग्रेजी में लिखैथ छैथ! जेनाकी: मुह्चोरबा, कुक्कुर के नान्गड़ इत्यादी.. :-))
मुख्यतः जे हमरा समझ में आयल उनकर सबके विचार पढला के बाद ओकर सारांश निम्नवत अछि:
(१) जे लोग अंग्रेजी में लिखैत छैथ उनका अंग्रेजी नीक जँका नहीं आवैत छाई तयं ओ मैथिलि फोरम पर अंग्रेजी में लिखित छैथ; कियाकि अगर ओ अंग्रेजी फोरम पर अंग्रेजी लिखतः ता उनकर अंग्रेजी के गलती पकड़ा जेतैइ. (हमर समझ स इ विचार त बहुत हास्यास्पद अछि, अहाँ की कहैत छि?)
(२) जे लोक अपन बच्चा सब के अंग्रेजी सिखावैत छैथ , ओ अपन बच्चा के भविष्य पर ग्रहण लगावैत छैथइ.
(३) अगर कोई सदस्य अंग्रेजी में अपन विचार लिखने छैथ, त फोरम के करता-धर्ता (Moderators) के द्वारा तुरंत ओही विचार (Comments) के मिटा (Delete) देल जाओइ. (हमर राय: इ त ओहिना भ गेल जेनाकी सीयार-सारस के कहानी, जेकरा में मेहमान के बजाक उनका भुखले राखु कियाक त उनकर खाई के तरीका मेजबान स अलग थिक!)

जहाँ तक हमार समझ अछि, कियो गोटे के विचार प्रकट करै में भाषा के रुकावट ताबैत धरी नहीं होयबाक चाही जाबित धरी पाठक/सदस्य (Audience) के ओही भाषा के समझाई में कोनो समस्या नहीं होई. मातृभाषा के प्रयोग आ बढ़ावा देनाई अत्यावश्यक थिक परन्तु अगर अहाँ एही चीज में उलझब त अपन आप के कूपमंडूक बना लेब. हम इ बातक हार्दिक समर्थन करैत छि जे नव-पीढी के लोग के मैथिलि अधिकाधिक प्रयोग करबाक चाही, परन्तु अगर अहाँ के इच्छा अछि जे हमर प्रदेश भी दोसर (विकसित/संपन्न) प्रदेश के माफिक या अओर नीक होय त हमरा सब के मानसिक रूप स अधिक विकसित होबय पडत. महात्मा गाँधी कहने छैथ, "हम नै चाहैत छि जे हमर घरक चारू दिस स दिवार रहै आ हमर घरक खिड़की सब हमेशा बंद रहै. हमर इच्छा अछी जे सब तरहक संस्कृति के प्रवेश हमर घर में होय; परन्तु, इ बातक ध्यान रखे पडत जे बाहरक संस्कृति स हमर कदम नै डगमगाई.(I do not want my house to be walled in on all sides and my windows to be stuffed. I want the cultures of all the lands to be blown about my house as freely as possible. But I refuse to be blown off my feet by any, by M. K. Gandhi)"
सम्मानित पाठक-गण, अहूँ सब सोचैत होयब जे 'दहेजमुक्त मिथिला' के मंच पर हम इ की लिख रहल छि? से, आब हम मुद्दा के बात पर आबैत छि.

मिथिला के दहेज़ के मकडजाल स मुक्त करै के रस्ता में सबस पैघ बाधा हमर सबहक एहन तरहक सोच अछि! जाधैर हम सब अपन सोच के कनी विस्तृत नै करबय, ताबैत हम सब इ कुरीति के केनाक दूर क सकैत छि? एही दिशा में हमर तर्क अछि जे:
(१) अपन सोच के विस्तृत करी ताकि हम सब भाषाई अओर भौगोलिक सीमा स आगू बढ़ी के इ मुद्दा पर मंथन होय.
(२) इतिहास गवाह अछि जे जे गोटे अपना आप के एही तरहक बंधन में सिमित केतह, ओ या त विकास नहीं क सकलाह या धीरे धीरे ख़त्म भ गेलाह. वर्तमान में अगर अहाँ दुनिया के साथ चलबाक इच्छुक थिक त अहांके सीमान्त सोच स आगू बढ़ पडत. समस्या चाहे दहेज़ के होय या अशिक्षा के, जाबित हम सब अपन सोच नहीं विस्तृत करबय, ताबैत हम सब ओकरा स लड़ी नहीं सकैत छि.
(३) एकटा मुख्य गप्प, जे माननीय लोग अंग्रेजी में प्रकट विचार के ल क अतेक सख्त-प्रतिक्रियावादी भ सकैत छैथ, ओ दहेज़ (या दहेजक विभिन्न रूप) स्वरूपी प्रथा के दूर करै के बात केनाक स्वीकार करताह? आखिर दहेज़ प्रथा भी त हमर सबहक संस्कृति स जुडल अछि (या कालांतर में संस्कृति सं जोड़ी देल गेल अछि!)!
(४) दहेज़ प्रथा के मिटाबाई के लेल हमरा सबके काफी प्रतिरोध के सामना कराय पडत, इ बात त बुझल थिक. अगर हम अपन बहिन-बेटी के स्वाबलंबी नहीं बनायब त ओ विवाहक बाद ओही स्थिति में रहत जे में हमर सबके दादी-नानी अओर पूर्वज-स्त्रीगण रहैत छलैथ. स्वाबलंबी बनाबाई के उद्देश्य ओकरा पति के सहयोग देबय के योग्य बनोनाई अछि, मानसिक, वैचारिक, सामाजिक, अओर वक्त पडला पर आर्थिक सहयोग भी. एही के लेल भाषाई या क्षेत्रीय सीमा स ऊपर उठय पडत. (हम इ बातक उम्मीद करैत छि जे किछु गोटा हमर राय स पूर्ण रूपेण सहमत नहीं होयताह, परन्तु इ त सामूहिक वार्तालाप के अभिन्न अंग थिक न??)
(५) किछु लोग के मन में इ शंका भ सकैत छै जे ऐना त हमर सबहक मैथिलि के सशक्त करै के उद्देश्य नहीं सफल होयतै! लेकिन, अहाँ गौर करू, दोसर भाषा के प्रयोग आ समर्थन मैथिलिक विकास में संभवतः कोनो बाधा नहीं डालत. हम अगर वैचारिक रूप स संपन्न रहब तखने हम सब अपन भाषा के अओर सशक्त करै के दिस कोनो ठोस कदम उठा सकैत छि. हम अगर सिर्फ-आ-सिर्फ मैथिलि के प्रयोग करै के समर्थक रहब त संभवतः हमरा सभके उन्नति के पर्याप्त अवसर नहीं भेट पाओत आ आख़िरकार अपन भाषा के ल क अपन मन में सम्मान कम भ जायेत; एकर विपरीत अगर हम समकालीन विचारधारा के समर्थन करैत आई के जमाना में जे भी जरूरत होयत ओ भाषा में भी संपन्न होयब त सामाजिक, वैचारिक, आ संगही आर्थिक उन्नति भी होयत.

हाँ, एकटा बात त अन्तर्निहित अछि जे हर चीज के नीक आ बेजाय दुनूं तरहक प्रतिफल होयत अछि, से ल क परिणाम हमरा सब पर निर्भर करैत अछि जे हम सब कोना क अपन सोचक दायरा विस्तृत करैत मिथिला के एही कुरीति स निजात दियाबई के दिशा में अग्रसर होयत थिक या केवल संकुचित मुद्दा सब पर अपन गाल बजाबाई रहब?

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सोमवार, 7 मार्च 2011

कारण बताऊ -------की सम्भब्भ अछि जे दहेज़ प्रथा के अपना समाज से उठायल जा सकैत अछि ?

की सम्भब्भ अछि जे दहेज़ प्रथा के अपना समाज से उठायल जा सकैत अछि ?
कारण बताऊ -------

अहि प्रथा के अन्तोगातावा कोनाक हेताय ? जे आगू के जिनगी में जिबैय के कारण बन्तैय
अपन बिचार किछ अहं द सकैत छि ? ----
बहुत बुजुर्ग सब गेलैथी और छैथि ,जे कतेको सस्त आ महाग जिनगी देखलखिन अनुभाभ केलैथि , आ बहुत रास अपन कीर्ति सेहो क गेलायथी, की हुनकर ई जरुरत नै छालें जे अहू के ख़तम का दिय , की हुनक सबके निक लागैत अछि जे आगू के पीढ़ी में हमर बल - बच्चा के की हेतयक , आ नव युबक के त जबाब नै जे , की देखता आ की करता अपन जिनगी में ,

किछ अहै बात पर उलेखय अछि जे से जानू ------

१ . लोग कहैत अछि जे , नव्युबक अगर प्रेम वियाह पर जोर देथिन त ई समस्या के किछ निदान हेतैय

२ . अगर प्रेम वियाह पर धयान देल जय त अहि से मिथिलांचल के संस्कृत पर आंच नै अबैत अछि , जकर कारण अछि जाती प्रथा , एगो वर्ण दोसर वर्ण में वियाह नै क सकैत अछि , ई मिथिला के प्रधानता अछि , अगर प्रेम प्रधानता पर बिचार करी त ई उछित नै , प्रेम जैत और सकल नै देखैत अछि प्रेम अछि त नाम और जैत नै ,

३. अगर दहेज नै लैत छि त हम सब लोग से मजबूर बनल छी ,कारण जे आई के जुग में सब अपन पद प्रतिस्ठा के लेल जीबैत अछि ,

४ . दहेज़ आर्थिक अबस्था पर सेहो प्रभाब करैत अछि , यदि जीतू जी के लग धन्सम्पति अपार छैन , ओ फाला जा के ओहिठाम केना कुटमैती करता , हुनका लग भोजन करैक ले सही बैबस्था नै छैन , ओहीठाम एक दोसर के समाबेस भेनाई बहुत कठिन लागैत अछि , एकर बराबरी होयत दहेज़ से , जे हिनका लग एतेक ओकात छैन ,

४ . एकर जिमेबार के अछि ? हम की अहाँ या कियो और ?
उतर भेटल जे सब कियो --- से केना ? अहाँ बताऊ

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आउ! दहेज उन्मूलन योजना बनाउ...

एहि जालवृतपर बेसी युवक लोकनिक जमघट अछि, एहि बात के ध्यानमें रखैत - संगहि अन्य किछु थ्रेडपर विभिन्न प्रकारक वार्तालाप, आलाप-प्रलाप, आदि के सेहो ध्यानमें रखैत - आ तहु सऽ बेसी जे वास्तविक जीवनमें हमरा-अहाँसंग वास्तवमें दहेजसँ सम्बन्धित घटना-परिघटना घटित भऽ रहल अछि - ताहि सभके समग्र रूपमें ध्यान में रखैत हम चाहैत छी जे अपने लोकनि अपन समयके सकारात्मक दिशामें प्रयोग करी - दोसर हेतु नहि, अपना हेतु शपथ खाइ जे -

"हम मानव जीवनके धारमें सभ मानवके अपनहि समान बुझि प्राकृतिक न्यायसँ भरल व्यवहार करब।"

एहि शपथकेर मूल अर्थ एतबे छैक जे हम अपना लेल जे दोसरसँ अपेक्षा रखैत छी, हमहुँ दोसर प्रति तहिना श्रद्धा-भावपूर्ण व्यवहार करब।

१. यदि हम अपन बेटी हेतु नीक घर-वर तकैत छी, आ पैसा-वस्तु-दहेज देबयके लेल तत्पर छी, अवश्य हम दोसरोसँ अपेक्षा राखब जे हमरो बेटा बेरमें सूदि सहित असूलब। ;) मुदा कि प्राकृतिक न्याय भेलैक एहिठाम?

हमर विचारसँ - जरुरी नहि छैक जे हम जेहि श्रेणीमें छी, ताहि श्रेणीक दोसर परिवार कोनो वैज्ञानिक तराजूपर, वेभसाइटपर, धरातलपर, सौराठ सभामें... या कोनाहु तुरन्त भेटि जाय - विरले एहेन जोड़ी बनैछ - वर-कन्याके जोड़ी जे सभ प्रकारसँ अकाट्य होइ, समधि-समधिनके सम्पन्नता एवं व्यवहारिक ज्ञानमें समानता, भाषा-धर्ममें समानता, संस्कारमें समानता, आदि अनेक बात छैक जे लोक अपन समान दोसरमें तकैत छै कुटमैतीके समय में। तऽ पहिल विन्दुपर देखल जाय तऽ इ कहनाइ असम्भव छैक जे अपने दहेज दैक लेल सक्षम छी तऽ लेबयके लेल सेहो तत्पर रहू तऽ न्याय होयत, एकदम अन्याय हेतैक। यदि अपने सहीमें मानव छी, मानवताक धर्म सर्वोपरि मानैत छी, प्राकृतिक न्यायमें विश्वास अहि तऽ एहि भ्रांतिके दूर करू। जतेक अपनेक क्षमता अहि, ताहि प्रकारसँ बेटीके विदाई करी, एवं तहिना बेटाक समयमें समधिक पक्षकेँ, स्वायत्तताकेँ, स्वेच्छाकेँ सम्मान करियौन; नहि कि माँग रखियौन, दबाव बनबियौन... वर-कन्याक आत्मा कोना एक अर्ध-नारीश्वर शिव बनत ताहिपर मात्र विचार करियौक। एहि चेतनाकेँ सदा अपनाउ आ एकरा सम्बर्धन करियौक।

एहि प्रकारसँ - हम अपने लोकनिसँ आग्रह करैत छी जे विभिन्न शर्त-हालतकेर सिरियल नंबर दैत लिखी, अपन विचार दी एवं उपलब्ध सभ सदस्यसँ विचार ली। सामाजिक चेतनाक जागृति हेतु नाटक मंचन करी, नुक्कड़ नाटक बहुत प्रभावकारी होयत। यदि अपने लोकनि एकर १० मिनट मात्र गाम-गाम, नगर-शहर, गली-कुची प्रदर्शन करब तऽ एकदम प्रभावकारी होयत।

अपनेक विचार पढबाक आश में - प्रवीण चौधरी ‘किशोर’

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शुक्रवार, 4 मार्च 2011

दहेज़ मुक्त मिथिलाक उद्येश,....

दहेज़ मुक्त मिथिलाक उद्येश,.....

किछु दिन पहिने जितमोहन जी के एकता पोस्ट वोइस ऑफ़ मिथिला पैर आयल, जे आई प्रकार सँ छल:-

आय हम मैथिल बंधूक माध्यमसँ ई जानैक इच्छुक छी जे..

मिथिलाक नाम पर बहुत आन्दोलन चैल रहल अछि!

मुदा की मिथिला में दहेज़ प्रथाक लेल कुनू आन्दोलन चलत ?? यो मैथिल बंधूगन कहिया ई दहेजक महा जालसँ मिथिला मुक्त हेत... ??


अई विषय पर बहुत रास प्रतिक्रिया आयल, किछु उत्साहित किछु, किछु व्यंगात्मक, किछु प्रश्नवाचक,

किछु नवयुवक एहन छाला जे आपन जीवन में बहुत नीक मुकाम पर छैथ ऑओ अपन जीवन के निर्णय

अपने लेवा में पूर्ण सक्षम छैथ, जखन ओ सब आई विषय के समर्थन केला की मिथिला के दहेज़

मुक्त कायल जाय, तखन त छाती ३६ इंची भा गेल, मुदा अई विषय में एक त मुख्य गप जे सामने आयल ओ

इ की जे कियो बिना दहेज़ के विवाह करता से कनिया मनपसंद करता, बात त बब्बू बर सार्थक थीक, आ

होबाको सहे चाही, ताई पर हमरा लोकिन ई ब्लॉग के निर्माण केना छि, हमरा सब के आशा जे अई मुहीम में

अधिकाधिक नवयुवक आ हुनक माता-पिता जुरैथ आ अई दहेज़ रूपी कलंक के धोबा में सहयोग करी.


हम आपने लोकिन स ईहो आग्रह करब जे "दहेज़ मुक्त मिथिला" विषय पर अपन अपन विचार अवश्य

लिखी.

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मंगलवार, 1 मार्च 2011

दहेज़??? We 'Maithil' don't support it!

"बड़ रे जतन सँ हम गौरी दाई के पोसलौं, पोसलौं नेह लागायल..सेहो शिव शंकर नेने जाय..
सोने सँ गौरी मोरे कोना का रहतीं.. बाबा घर छुटल जाए..!
एही बर लेल गौरी बड़ तप कैली बड़ ताप कैली, कारियों उमा के बिदाय..
आँगन बीच हेमंत ऋषि कानैत, सून भेल मैना के दुआर.. बाबा घर छुटल जाय..!
छाती पीट-पीटी मैना कानैत,  के मोरे उमा लेने जाय..
छोटे छिनी सौ हम पाली पोसी केलों, अपन करेजे लगाय..
बाबा घर छुटल जाय..बाबा घर छुटल जाय.."

I believe you readers can identify the lyrics of one of the Maithili Vivaah Songs we all love to play, sing and enjoy (its basically a महेशवानी). I also assume that it is not required to explain the soulful meaning and feelings this song (and obviously many other such songs) portray. Apart from other things, it definitely conveys the feelings of parents of a girl who is getting married and leaving for her husband's house. This songs along with many other Maithili songs has become part of the tradition we unmistakenly follow during marriages in our community, especially when we are the host, i.e. from the marrying girl's side.


Maithili marriages, originally, are known as a ceremonious event filled with traditional rituals in various forms, women singing different format of folk songs to express their gratitude to the lord, affection to the marrying couple, small jokes and laughing moments with new bride and bridegroom, sadness for bride leaving her parental home, and so on. Whenever we talk about the marriage system in Mithila, it automatically incorporates the mention of the dowry - one of the worst form of traditions deeply rooted in Indian culture.  Though it is oblivious that the system was started as bride's family's gesture of respect and welcome to those of bridegroom's family, usually in the form of small gifts, household stuffs, clothes, etc. Eventually it became a (almost mandatory) part of any marriage. And with the passage of time, as consumerism and bragism are becoming a not-so-unusual thing, the tendency of ours is to promote this ill-trend, directly or indirectly, intentionally or forcefully; either way we are becoming more and more involved in spreading this kuriti (कुरीति).


Now let me raise some real issues of concern in this regard. Almost all of us do know that giving and receiving dowry is a crime, social as well as legal and moral (very similar to bribe, isn't it?). We all talk aloud about avoiding this practice, uprooting this (evil)tradition, and blah.blah..blah..!! Ironically, most of us are, directly or indirectly, supporting it. Though I am so far just an onlooker of this traditional devilious act (because I am still unmarried! ha..ha..ha..ha.. ;-)), I have witnessed some very unwarranted sequences relating to dowry. The major cause of concern is that the (pseudo) traditional act of gifting has been changing its form and those who are against of this trend, are also supporting it and involved in it. You may be wondering what is this (pseudo) tradition in turning into? Yeah, think about it!

The bride's family granting heavy materialistic gifts to the bridegroom's family in the form of household stuff, jewellery, land, property, monetary benefits such as investments, deposits etc., not a thing of past, for sure. I mean they still practice gifting in these formats, definitely. But, what we are missing to notice is another form of this act that is grabbing poor Maithil brides' families. Those (bridegrooms' families) who are publicly not taking such materialistic gifts from brides' families, they are too encouraging the poor chaps to spend more and more on other activities in weddings such as hospitality etc.

The tradition of imitating the "big fat Indian wedding" is taking its roots in Maithil community. Bride's family is kind of forced to provide grand hospitality to the bridegroom's family and the Baraat, even if bride's family is not able to host them in such manner. They are forced to spend money on welcoming the bridegroom party in a huge and royal way. Though its not unexpected that bride's party does all this in their best possible way, but don't you think the 'best-possible-efforts' are not what the bridegroom's party wants from their counterparty. It is something (much much) more than that. They want something if not like the "Yash-Chopra's-films-kind-of-weddings", then at least a local version of those big fat Indian weddings. Such expectations may be including anything but not limited to great multi-cuisine dinner arrangements in western style, iconic decoration (which neighborhood people will be talking about for some time), band-baaja etc (the one most famous around is least what us expected!), and many other things copied either from films or from hi-society weddings, and so on! Doesn't this sound like another (and modified) version of dowry? Don't you think its going to hamper (and may be vanish) the rich Maithil Vivaah culture for our next generation, leave from the minds of outsiders who believe that we have a very nice tradition in Mithila? Shall we not give it a thought and discuss about it?


PS: I have written this post considering the current trends being followed in the Mithila Community, and I don't intend to hurt anyone's sentiments in any manner. Feedback and participation are always welcome. Thank you!!

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