सुचना: प्रिय मैथिल बंधूगन, किछ मैथिल बंधू द्वारा सोसिअल नेटवर्क (फेसबुक) पर एक चर्चा उठाओल गेल " यो मैथिल बंधूगन कहिया ई दहेजक महा जालसँ मिथिला मुक्त हेत ?" जकरा मैथिल बंधुगणक बहुत प्रतिसाद मिलल! तहीं सँ प्रेरीत भs कs आय इ जालवृतक निर्माण कएल गेल अछि! सभ मैथिल बंधू सँ अनुरोध अछि, जे इ जालवृत में जोर - शोर सँ भागली, आ सभ मिल सपथ ली जे बिना इ प्रथा के भगेना हम सभ दम नै लेब! जय मैथिली, जय मिथिला,जय मिथिलांचल!
नोट: यो मैथिल बंधुगन आओ सभ मिल एहि मंच पर चर्चा करी जे इ महाजाल सँ मिथिला कोना मुक्त हेत! जागु मैथिल जागु.. अपन विचार - विमर्श एहि जालवृत पर प्रकट करू! संगे हम सभ मैथिल नवयुवक आ नवयुवती सँ अनुरोध करब, जे अहि सबहक प्रयास एहि आन्दोलन के सफलता प्रदान करत! ताहीं लेल अपने सभ सबसँ आगा आओ आ अपन - अपन विचार - विमर्श एहि जालवृत पर राखू....

सोमवार, 21 मार्च 2011

बेटी के दहेज़ के भार (अभय दीपराज )

बेटी के दहेज़ के भार..........

बनल असह्य संताप समाजक, बेटी के दहेज़ के भार !
भैया - बाबू गोर लगैत छी, बंद करू ई अत्याचार !!

जे बेटी जननी समाज के, मूल प्रेम - स्नेह के !
अपमानक हम पातक लेत छी, ओहि बेटी के देह के !
अपन मान सँ हम अविवेकी, अपने कयलौं दुर्व्यवहार !
भैया - बाबू गोर लगैत छी, बंद करू ई अत्याचार !!१!!

बड़ ज्ञानी, बड़ शिष्टाचारी, मानव बनि हम जन्म लेलौं !
नीति - न्याय के परिभाषा हम कयलौं, बड़ सद्कर्म केलों !!
सब यश पर भारी ई अपयश, संतानक कयलौं व्यापार !
भैया - बाबू गोर लगैत छी, बंद करू ई अत्याचार !!२

जेहि बेटी में दुर्गा - कमला और सीता के वास अहि !
ओ बेटी अपना नैहर पर बोझ बनल, उपहास अहि !
एहन पातकी - पापी छी हम, हाँ, एहि पातक पर धिक्कार !
भैया - बाबू गोर लगैत छी, बंद करू ई अत्याचार !!३!!

बेटी के अपमानक ई विष, उपटा देलक जों ई फूल !
हमर - अहाँ के, सबहक आँगन में नाचत विनाश के शूल !!
संकट ई गंभीर भेल अब, करिऔ एहि पर तुरत विचार !
भैया - बाबू गोर लगैत छी, बंद करू ई अत्याचार !!४!!

आइ अगर ई व्यथा हमर अछि, काल्हि अहाँ के ई अभिशाप !
एक - एक कय पेरि रहल अछि, सबके एहि ज्वाला के दाप !!
सबहक गर्दन, शान्ति और सुख, काटि रहल अछि ई तलवार !
भैया - बाबू गोर लगैत छी, बंद करू ई अत्याचार !!५!!

बनल असह्य संताप समाजक, बेटी के दहेज़ के भार !
भैया - बाबू गोर लगैत छी, बंद करू ई अत्याचार !!
रचनाकार- अभय दीपराज

1 टिप्पणियाँ:

मदन कुमार ठाकुर 21 मार्च 2011 को 9:54 am  

bahut nik abhay ji ahan t muhak bat chhin lelo जे बेटी जननी समाज के, मूल प्रेम - स्नेह के |
अपमानक हम पातक लेत छी, ओहि बेटी के देह के ||
अपन मान सँ हम अविवेकी, अपने कयलौं दुर्व्यवहार |
भैया - बाबू गोर लगैत छी, बंद करू ई अत्याचार || १ ||

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